Saturday, 1 August 2015

स्किल इंडिया : रोजगारपरक कौशल विकास का महाअभियान

केंद्र सरकार का एक बड़ा मिशन है- स्किल इंडिया। रोजगारपरक कौशल विकास का यह महा अभियान-प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना- एक साथ 101 शहरों में शुरु होने जा रही है। क्या यह क्षण भारत के भविष्य की एक नई तस्वीर रचने में सफल हो सकेगा? 

भारत में एक करोड़ 25 लाख नए युवा हर साल रोजगार की तलाश में घर से निकलते हैं। यह संख्या हर साल बढ़ रही है। भारत युवा देश है, और युवा देश होने का एक पहलू यह भी है कि यहां युवाओं को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना एक चिंता का विषय है। एक पहलू और भी है। मान लीजिए किसी किसान के या कारीगर के चार बेटे हैं और कोई दूसरा रोजगार न मिल पाने पर वे भी अपने पिता के ही काम में शामिल हो जाते हैं। जो काम एक व्यक्ति करता था, वही काम पांच करने लगते हैं। यानी उनमें से कम से कम चार के पास वास्तव में कोई काम नहीं होता है, वे बेरोजगार होते हैं,लेकिन रोजगारशुदा नजर आते हैं। सिर्फ मजदूरों के बच्चे नहीं, दुकानों पर, कंपनियों में और अन्य जगहों पर भी, ऐसे लोग रोजगार में लगे नजर आते हैं, जिनके काम से उत्पादकता पर कोई खास असर नहीं पड़ता। यह प्रछन्न बेरोजगारी की समस्या है, जो 1 करोड़ 25 लाख के आंकड़े को और गंभीर बना देती है। कैसे मिलेगा इन्हें रोजगार? जवाब सिर्फ रोजगार के नए और उत्पादक अवसरों में है। और रोजगार अवसर मुहैया कराने की हमारी क्षमता कैसी है? (तत्कालीन) योजना आयोग के आंकड़ों के अनुसार, 2004-05 से 2009-10 तक, पांच वर्षों में भारत में रोजगार के मात्र 27लाख नए अवसर पैदा हुए हैं, जबकि आवश्यकता लगभग 6 करोड़ अवसरों की थी। इतना ही नहीं, 2009-10 में 1 करोड़ 57 लाख लोग कृषि क्षेत्र से बेरोजगार हुए, और लगभग 72 लाख लोग विनिर्माण क्षेत्र से। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि हमें रोजगार के नए अवसरों का सृजन कर सकने की अपनी क्षमता तेजी से बढ़ानी होगी।

कई युवा शिक्षित भी हैं लेकिन उन्होंने जो कुछ पढ़ा-लिखा-सीखा है, उसमें से रोजगार दिलाने लायक कम ही है। और जो रोजगार में हैं, उन्हें अपनी औपचारिक शिक्षा से कोई लाभ बहुत कम ही होता है। वास्तव में रोजगारशुदा लोगों में से सिर्फ 2.3 प्रतिशत ऐसे हैं, जिन्हें अपने काम की दक्षता किसी शैक्षणिक कार्यक्रम से औपचारिक तौर पर मिली हो। बाकी सब चलते काम में हाथ बंटाने की स्थिति में हैं। इसके विपरीत, दुनिया के विकसित देशों में 75 प्रतिशत से लेकर 96 प्रतिशत तक लोग अपने कार्य के बारे में औपचारिक तौर पर दक्ष हैं।

फिर हम दुनिया के सबसे युवा देश भी हैं। आज की स्थिति में भारत की जनसंख्या में पाया जाने वाला सबसे बड़ा आयु वर्ग 27 वर्ष की औसत उम्र के लोगों का है, जो चीनियों से औसत उम्र में 10 साल कम है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार भारत में लगभग 36 करोड़ लोग 10 से 24 वर्ष की बीच की आयु के हैं, जो अमेरिका की कुल जनसंख्या से भी ज्यादा है। 2020 तक भारत की जनसंख्या की औसत आयु 29 वर्ष होगी, जबकि औद्योगिक देशों में यही आयु 40 से 50 वर्ष के बीच होगी।

ऐसा नहीं है कि बाजार में नौकरियां नहीं हैं। लेकिन आवश्यकता से कम हैं, प्रायः असंगठित क्षेत्र में हैं, उनमें आमदनी भी मामूली है और उत्पादकता भी मामूली है। कोई होनी-अनहोनी हो जाए, तो वह नौकरी कोई दिलासा देने की स्थिति में भी नहीं होती।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने युवा देश के इस पक्ष का कई बार जिक्र किया है। यहां प्रश्न सिर्फ युवाओं को किसी कार्य की दक्षता देने का नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसा रोजगार दिलाने का है, जो वास्तव में आय का सृजन करता हो। रोजगार के अवसर सृजित करने के लिए एक ओर तो नए-नए उद्योग-धंधे चाहिए, और दूसरी ओर उनमें काम करने के इच्छुक युवाओं में काम कर सकने की दक्षता चाहिए। तीसरे और थोड़े बारीक स्तर पर, ऐसे लोग भी चाहिए, जो उद्योग शुरु करने में उत्सुक हों, उसकी क्षमता रखते हों। फिर रोजगार को कम से कम इस लायक तो होना ही चाहिए कि वह किसी अनपेक्षित स्थिति में अपने श्रमिकों की, उनके परिवार की कुछ चिंता कर सकता हो।

लिहाजा, इस समस्या से एक साथ कई स्तरों पर निपटा जा रहा है। आशा है कि मेक इन इंडिया का विश्व व्यापी अभियान भारत में नए उद्योग-धंधों की आवश्यकता को एक हद तक पूरा करने में सफल रहेगा। दूसरे स्किल इंडिया अभियान भारत के युवाओं को या इनकी मदद से शुरु होने वाले अन्य उद्योगों में रोजगार दिलाने में सफल रहेगा। स्मार्ट सिटीज का अभियान विशेषकर इन नए उद्योगों और उनमें काम करने वालों की रिहाइश और उनके शहरीकरण की आवश्यकताएं पूरी करेगा। किसी होनी-अनहोनी की स्थिति से निपटने में प्रधानमंत्री की विविध बीमा योजनाएं मददगार रहेंगी। जैसे–जैसे मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी के अभियान गति पकड़ते जाएंगे, प्रधानमंत्री की बीमा और सामाजिक सुरक्षा की अन्य योजनाओं में कुछ ऐसे नए पहलू जुड़ते जाएंगे, जो कई उद्देश्यों को एक साथ पूरा कर रहे होंगे। इस तरह की कई परियोजनाएं एक साथ काम करेंगी, तब युवाओं के रोजगार और उनकी खुशहाली का लक्ष्य प्राप्त हो सकेगा। प्रधानमंत्री ने इससे भी बड़ा लक्ष्य देश के सामने रखा है। उन्होंने देश का आह्वान किया है कि वह भारत को कौशल का वैश्विक केन्द्र बनाने का संकल्प ले। वह भारत को मैन्युफैक्चरिंग यानी विनिर्माण का वैश्विक केन्द्र बनाने का इरादा पहले ही जता चुके हैं। जाहिर है, एक के बिना दूसरे की गति नहीं है। सरकार का लक्ष्य 2022 तक 15 करोड़ भारतीय युवाओं को काम का हुनर, कुशलता, दक्षता या स्किल सिखाना है।

लेकिन अगर सभी नौकरी मांगेंगे, तो नौकरी देगा कौन? आप सिर्फ विदेशी नियोक्ताओं पर निर्भर नहीं रह सकते। निश्चित रूप से कुछ लोगों को तो आगे आना ही होगा कि हम बायो-डाटा देंगे नहीं, बल्कि लेंगे यानी उनको उद्यमी बनना पड़ेगा। यहां उद्यमिता के विकास का पक्ष सामने आता है। सरकार ने इन दोनों प्रश्नों का उत्तर एक साथ देने के लिए कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय स्थापित किया है। इस स्किल इंडिया अभियान में20 से अधिक केन्द्रीय मंत्रालय, 70 से अधिक योजनाएं बनाकर काम कर रहे हैं।

गौर करें तो सारी गतिविधियां एकदूसरे से जुड़ी हुई हैं और एक दूसरे की पूरक हैं। गंगा की सफाई और राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन, और यहां तक कि कृषि संबंधी योजनाएं भी अंततः इसी बेहतर और संपन्न-समर्थ भारत के निर्माण की दिशा में जाती हैं। ऐसे में यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्किल इंडिया अभियान की शुरुआत वाले दिन ही , नीति आयोग की संचालन परिषद की बैठक बुलाई जिसमें मुख्यमंत्रियों के साथ भूमि अधिग्रहण विधेयक पर भी चर्चा की गई। 

चुनौती मात्र इतनी नहीं है। कौशल विकास का कार्य बहुआयामी है। इसमें केन्द्र और राज्य- दोनों सरकारों की भूमिका होती है, उनके विभिन्न विभागों की भूमिका होती है। सिर्फ सरकार ही नहीं, कई उभरते क्षेत्र ऐसे हैं, जिनमें कौशल का प्रशिक्षण देने वाले लोग निजी क्षेत्र से बुलाने होते हैं। नियोक्ताओं को भी इस अभियान से जोड़ना होता है। एक स्थिति ऐसी भी आती है, जब नई तकनीक के लिहाज से कर्मियों को प्रशिक्षित करने के साथ ही, नियोक्ताओं को भी प्रशिक्षित करना होता है। सारे कार्यक्रम की प्रभावशीलता को लेकर भी अतिरिक्त सतर्कता बरतनी आवश्यक होती है। रोजगार का बाजार अंततः सेवाओं और वस्तुओं के देसी-विदेशी बाजार पर निर्भर होता है, लिहाजा वित्तीय और अन्य नीतियां भी इससे जुड़ती हैं। शिक्षण संस्थानों से लेकर प्रशिक्षकों तक और नियोक्ताओं से लेकर उद्योगों तक की भागीदारी और सहयोग एक साथ निश्चित किया जाना अनिवार्य होता है। कोई संदेह नहीं कि हम एक अनूठे रास्ते पर बढ़ चले हैं। लेकिन वास्तविक कौशल अड़चनों को दूर करके आगे निकलने में ही है। भारत को अपना यह कौशल विकसित करना है, सिद्ध करके दिखाना है।

*श्री ज्ञानेंद्र नाथ बरतरिया प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार हैं। 



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SOURCE - PIB